कान की बीमारियां

कान की बीमारियां

बहरी कान की बीमारियों को समझने के लिए हमें बाहरी कान की संरचना समझना आवश्यक है।
कान के संक्रमण :-
कान के खुजलाने पर पिन, काड़ी, चाबी से खुरचने से या कण छेदने की असुरक्षित पद्धति से कान में संक्रमण हो सकता है। कुछ वस्तुएं जैसे क्रीम , इत्र , कान मेँ उपयोग में आने वाली दवाइयों की एलर्जी से भी संक्रमण होता है। कान लाल हो जाता है , खुजली आती है एवं दर्द हो सकता है। ऐसे मरीजों को इन चीजों का उपयोग न करने की सलाह दी जाती है।
बाहरी कान के दो भाग होते हैं :-
कान या पिन्ना जो हमें दिखता है और उसकी बनावट हमारे चेहरे के अनुसार आनुवांशिक गुणों पर आधारित होती है। यह एक कार्टिलेज है जिस पर एक झिल्ली होती है एवं ऊपर चमड़ी , परन्तु यहाँ चर्बी की पार्ट नहीं होती। कान की नली जो साधारणतः २. ५ से. मी. लंबी होती है , इसके अंदर के सिरे पर परदा होता है। यह नली घुमावदार होती है ,यहाँ पर चमड़ी बहुत पतली होती है उसमें कई बाल एवं कुछ ग्रंथियाँ होती हैं जो सेरुमेन नामक पदार्थ बनाती हैं। साधारणतया कान की चमड़ी बाहर फेंकती जाती है।
बाहरी कान में होने वाली बीमारियां :- कान मेँ चोट लगना :-
बाहर के कान मेँ काट जाना , खून जम जाना या नली मेँ फ्रेक्चर आदि। इससे कान में अत्यधिक दर्द होता है , क्योंकि यहाँ की चमड़ी कान के कार्टिलेज से चिपकी हुई होती है।
फ्रोस्ट बाइट :- अत्यधिक ठंडे प्रदेशों में यह तकलीफ होती है , क्योंकि यहाँ की खून की नालियों पर चर्बी का सुरक्षा कवच नहीं होता है , कान मेँ खून का दौरा कम हो जाता हैं , मगर यह लम्बे समय तक हो तो कान दे ऊत्तक सड़ जाते हैं। इस भाग को धीरे -धीरे गर्म किया जाता है व खराब ऊत्तकों को निकालकर दवाई लगाई जाती है।
फॉरेन बॉडी :-
अर्थात कान में कीड़ा ,मोती , चना , गेंहू अन्य वस्तुओं का चले जाना या डाला जाना। कई बार बच्चे खेलते -खेलते छोटी -छोटी वस्तुओं को कान मेँ डाल देते है। उन्हें विशेष औजारों के द्वारा निकाला जाता है। अगर वस्तु अधिक अंदर हो तो बच्चे को बेहोश कर दूरबीन द्वारा भी इसे निकाल सकते हैं। कई बार सिरिजिंग द्वारा भी इसे निकाल सकते हैं। कई बार सिरिजिंग द्वारा भी निकाल सकते हैं। कई बार सिरिजिंग द्वारा भी निकाल सकते हैं।
अगर कीड़ा , मच्छर , झिंगूर, कान मेँ गया हो तो कान मेँ कुछ बूंद तेल डालने से कीड़ा मर जाता है , क्योंकि उसे ऑक्सीजन नहीं मिल पता और फिर उसे आसानी से निकाला जा सकता है।
मैल , वेक्स या सेरुमेन :-
कान से मैल अपने आप न निकल पाने की स्थिति में मैल जम जाता है। जिस पर तेल , धूल, धुआँ , कचरा आदि हो तो यह कड़क हो जाता है। तब इसे निकालना जरुरी होता है। कुछ दवाइयां जो मैल को नर्म करती हैं , उन्हें डालकर मैल आसानी से निकाला जाता है।
पेरीकॉन्ड्रायटिस :-
अपने कान के कॉर्टिलेज एवं उसके ऊपर की झिल्ली का संक्रमित होना। कान लाल , सूजा हुआ दिखता है। पानी जैसा द्रव्य बह सकता है एवं संक्रमण गाल, गले आदि पर फ़ैल भी सकता है। अत्यधिक दर्द होता है। तुरंत इलाज के द्वारा इसे ठीक करना चाहिए क्योंकि बार -बार ऐसा संक्रमण होने पर कान का कार्टीलेज गद्देदार हो जाता है। इसे कॉलीफ्लॉवर ईयर कहते हैं। कार्टीलेज में चोट अधिकतर मुक्केबाजी करने वाले लोगों में होती है।
जलना :-
शरीर के जलने के साथ कान भी जल सकता हैं। परन्तु कान के घाव बहुत धीरे भरते हैं।
नेक्रोटाइसिंग मेलिगनेंट ऑटायटिस :-
यह कान की नली का अत्यंत खरतनाक संक्रमण है। फंगल ऑटायटिस अर्थात कान में फंफूद के द्वारा संक्रमण अधिक होता है। कान मेँ खुजलाने पर, पानी जाने या पहले से संक्रमित कान में यह संक्रमण अधिक होता है। इसके अलावा मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति एड्स एवं ऐसे मरीज जिनकी रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति कम हो गई है , उनमें यह अधिक होता है।
इसमें कान में दर्द होता है। फंफूद निकलती है। यह ज्यादातर काली एवं सफ़ेद के साथ में संक्रमण होने से होती है। एंटी फंगल कान की दवाइयां से दर्द निवारक से इसे ठीक किया जाता है।

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