दवाओं की मार – जिगर को करे  तार तार

दवाओं की मार – जिगर को करे तार तार

‘ जिगर ‘ यह शब्द कवियों , लेखकों और चिकित्सा शास्त्रियों सभी को विशेष महत्व वाला लगता रहा है। जहाँ कवियों ने जिगर की महत्ता पर प्रेमी प्रेमिकाओं की व्यथाकथा में बड़े ही रोचक और मार्मिक रूप से समय समय पर प्रस्तुत की है। वही लेखकों ने दिल , जिगर की जुगलबंदी से अपने उद्गारों को नौ रसो से संवर कर साहित्य सृजन का क्रम अनवरत जारी रखा है।
चिकित्सा शास्त्रियों की लिए भी ‘ जिगर ‘ कोई छोटी मोटी या अल्प महत्व वाली शारीरिक संरचना नहीं रही। वाइटल आर्गन्स में से एक अतिमहत्वपूर्ण यह अवयव शरीर की कार्यप्रणाली में बेहद जटिल और कार्यक्षम यह रचना सरे जीवन भर समय -समय पर अलग -अलग कार्यो का सम्पादन अनवरत रूप से करती रहती है।
आपाधापी भरे जीवन में जिगर के टुकड़े , लख्ते जिगर पर भावनात्मक चोट तो समाज के लोग पहुंचाते रहते ही हैं , पर चिकित्सा विज्ञान भी इस अतिमहत्वपूर्ण अवयव पर रासायनिक चोट पहुंचने से बाज नहीं आता है।
शरीर क्रिया के दौरान पाचन , उत्सर्जन , शोधन , रक्त निर्माण जैसी अनेक क्रियाओं के सम्पादन में महत्वपूर्ण दायित्व निभाने वाला यह अवयव दवाओं के सेवन से भी पर्याप्त मात्रा में क्षतिग्रस्त होता है। अनेक दवाइयों का सेवन व्यक्ति अनजाने मे करके इसको नुकसान पहुंचाकर, अकार्यक्षम बनाने में मदद करता है। वहीँ चिकित्स्क भी जानबूझकर इस बाबत कभी जानकारी देना उचित नहीं समझते हैं।
अंग्रेजी दवाओं के सेवन से रोग तो दूर वैसे ही होते है जिस तरह हमारे देश के नेता आश्वासन देते है कि हम पांच वर्षो में देश से बेकरी , भुखमरी दूर करके खुशहाली ला देंगे। रोजमर्रा की जिंदगी में जिन अंग्रेजी दवाओं का सेवन कराया जाता है उन दवाओं की जिगर पर मार की बानगी जरा देखिये जिसके बारे में बताना कोई चाहता नहीं है।
औषिधि सेवन से होने वाली और टॉक्सिक हिपेटाइटिस में भारी धातुओं का योगदान केवल १-२ प्रतिशत तक होता है। वह भी निश्चित तौर पर सत्यापित नहीं है। भारी धातुओं की जब अनियमित और अनियत्रित मात्रा का सेवन किया जाए और अपने मन से अनजानी मात्रा मे जड़ी -बूटियां का सेवन किया जाय तो जिगर की खराबी की संभवाना १ प्रतिशत से अधिक नहीं होती है। यद्द्पि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ वनस्पतियों में हिपेटाक्सिक गुण होता हो और इसी कारण इनका सेवन सोच समझकर आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से करना चाहिए। रोजमर्रा के जीवन में प्रयुक्त होने वाली आयुर्वेदिक दवाएं यदि उचित चिकित्सक की देखरेख में ली जाए तो ये हिपेटॉफ़्रेंडली ही हैं , इसमें कोई विवाद ही नहीं हो सकता है।
पर वहीँ अंग्रेजी दवाओं की एक लम्बी सूची बनाई जा सकती है जो कि खतरनाक सीमा तक हिपेटो टॉक्सिक हैं। ये दवाएं जिगर को अलग -अलग तरह से नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें से कुछ दवाएं लिव्हर सेल्स को अवरुद्ध करती हैं, कुछ इसकी कोशिकाओं को मोटा करके , कुछ सिकोड़ करके अकार्यक्षम कर देती है। कुछ दवाएं इन कोशिकाओं में घाव व सूजन पैदा कर देती हैं और कुछ इनमें गठाने पैदा कर देती हैं और आगे चलकर कैंसर भी पैदा करने की कला रखती हैं। आइये आपको आपके आसपास और रोज प्रयुक्त होने वाली इन अंग्रेजी दवाओं के बारे में जानकारी दे दें।
जिगर में विषाक्तता पैदा करने वालों की बात पहले करें – वे दवाएं जो लिव्हर में विष पैदा करके यकृत की कोशिकाओं को गलाती या सिकोड़ती हैं उनमें प्रमुख है दर्द निवारक दवा ‘ एसिटामिनोफेन ‘ हमारे देश में यह दवा दर्द का नाश और बुखार दूर करने के लिए धड़ल्ले से प्रयोग की जाती है। इसके ज्यादा या अनियंत्रित मात्रा आत्महत्या के लिए भी प्रयुक्त की जाती है। इससे उल्टी, दस्त , मिचली, बैचेनी , घबराहट और साथ ही यकृत में घाव होते है जो कि जिगर को स्थाई रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। अनियमित मात्रा ४ से ४८ घंटे में मारक प्रभाव पैदा कर देती है। कम मात्रा भी मौत का कारण आसानी से बन सकती है।
टेट्रासाइक्लिन, कार्बन टेटाक्लोराइड , टेक्लोरोइथाइलिन जैसी दवाएं भी यकृत में नेकरोसिस और घाव पैदा करते हैं। छोटे -मोटे घाव जब तक जॉन्डिस नहीं हो जाता पता भी नहीं चलते इस कारण रोगियों का एक बड़ा समूह इस बात से अनभिज्ञ ही रह जाता है। विविध प्रकार के साल्वेंट्स जो कि रंग रोगन में प्रयुक्त होते है या जो कि चिकित्सको द्वारा विविध कामों के लिए प्रयुक्त होते है जैसे डाई मिथाइल फार्मामाइड ये भी स्थाई तौर जिगर की विकृति पैदा करते हैं।
यकृत की कोशिकाओं को स्थूल बनाने और चर्बी के कारण उनकी कार्यक्षमता कम करने वाली दवाओं मे कीमोथैरेपी में प्रयुक्त दवाएं , विविध प्रकार के पेनिसिलिन्स, झटकों को रोकने वाली दवाइयां। जो प्रायः मिर्गी व अन्य इस तरह की बिमारियों में प्रयुक्त होती हैं। जैसे सोडियम वल्प्रोएठ , और हदद्रव याने धड़कन को कम करने वाली दवाएं जैसे एमिओडेरोन विशेष स्थान रखती है। झटके रोकने वाली दवाएं सीधे यकृत को उतना नुकसान नहीं पहुंचाती जितना इसके शरीर मे प्रक्रिया के दौरान बनने वाला रासायनिक घटक हानि पहुंचाता है।
यकृत की कोशिकाओं में घाव पैदा करने और शोध पैदा करने वालो में एलोपैथी की अनेक दवाएं आती है। झटको की चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाली फिनाइटोन, डाइफिनाइल , हाइडेन्टोइन जैसी दवाएं तीव्र शोथ के साथ आगे चलकर यकृत की पूर्ण कार्यहानि की क्षमता रखती हैं। इन दवाओं के साथ -साथ बुखार आना , गांठो का बढ़ना , पित्ती उछलना, अतिसक्रियता के लक्षणों का पैदा हो जाना आदि सामान्य तौर पर देखा जाता है। यह शुरुवात के दो महीनों में ही दिखाई देने लगता है पर……। इसी तरह बेहोशी के लिए प्रयोग की जाने वाली दवाओं मे हेलोथेन जो क्लोरोफार्म के समान ही होती है , प्रत्यूजरता पैदा करती है और अपरोक्ष रूप से यकृत हानि का कारण बनती है। रक्तचाप की दवा मिथाइलडोपा और इसके घटक क्लिनिकली, बायोकेमिकली और हिस्टो लॉजिकली यकृत की पर्याप्त क्षति करते हैं। इनके सेवन के दौरान अनेक प्रकार के लक्षण पैदा होते है। इनमे से बहुतो पर प्रायः रोगी भी अपने चिकित्सक का ध्यान आकृष्ट करते है।
कीमोथेरपी में खासतौर पर टीबी की चिकत्सा में प्रयुक्त होने वाली आइसोनियाज़िड नामक औषिधि की यकृत घातकता सर्व विदित है। इसके सेवन के दौरान शुरुवात से ही प्रत्यूर्जताजन्य लक्षण पैदा हो जाते हैं।
बहुतायत से प्रयुक्त होने वाली मुत्राल दवाएं जैसे क्लोरथियाजिड और दस्तावर दवाएं आइसोफेनसिटिन भी यकृत का कबाड़ा करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। ये अपने कार्यकारी अवयवों को थोड़ा लाभ और बाकी को हानि पहुंचाती है।
यकृत में छोटी -छोटी गठाने व ग्रेन्यूलोमा पैदा करने में दर्द और सूजन को कम करने वाली दवाओं फिनाइलबुटाझोन जैसे भी कोई कम कसर नहीं रखती हैं। सल्फोनामाइडस व गठिया में प्रयोग होने वाली एलयुप्यूरीनाल एंटीबायोटिक्स जैसे टाइमिथोप्रिम , सल्फामिथाक्सोल भी यकृत को पर्याप्त हानि व स्थायी विकृति प्रदान करते है।
यकृत में कठिनता लाकर इसके स्त्रावों को कम करने में थाइराइड की चिकित्सा में दी जाने वाली मेथीनीझोल , शक्तिवर्धक व चयापचयवर्धक मिथाइल टेस्टोस्टिरोन, इरिथ्रोमाइसिन और गर्भ निरोधक मुखसेव्य दवाएं जैसे -मस्ट्रोनाल, नारएथिंडोन महत्वपूर्ण भूमिका ऐडा करती है।
ऐसे ही मधुमेह की दवाएं क्लोरोप्रोपामाइड व नींद की दवाएं क्लोरोप्रोमाजिन भी पित्त का अवरोध करके यकृत की क्रिया का नाश करती है। ये सब धीरे-धीरे पित्त की नलिकाओं को खराब करती जाती है और अंततः यकृत कार्य बंद कर देता है।
फिर भी यकृत शरीर में वैसा ही अवयव है जैसा भारत में आम नागरिक। प्रतिपल प्रतिदिन होने वाले अत्याचारों के बाद भी दोनों ही उफ़ तक नहीं करते हैं। इन पर जानबूझकर अत्याचार किये जाते रहते हैं और उपर से कहा जाता है कि तुम्हारी भलाई के लिए ही तो सब किया जा रहा है। यह अवयव भी सब सहता है पर फिर भी अपना काम करता रहता है। शरीर का विकाश करने में अपना पूरा योगदान देता रहता है ,इसी आस में कि शायद कभी उसके आघातों पर भी कोई भी तो रहम करेंगा।

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