नाड़ी विज्ञान – आज की आवश्यकता

नाड़ी विज्ञान – आज की आवश्यकता

 

नाड़ी विज्ञान आज आवश्यकता है की प्राचीन नाड़ी विज्ञान को आधुनिक परिपेक्ष्य में प्रसारित एवं अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए, जिससे इस दुर्लभ ज्ञान का संरक्षण एवं जनहित में इसका उपयोग किया जा सके।

प्राचीन ग्रंथों में नाड़ी को स्पंदन जीव होने का साक्ष्य माना है। ये जीवन और सप्राणता की परिचायक है। वैसे तो , एलोपैथिक व यूनानी चिकित्सा विज्ञान भी नदी पद्यति को अपनाता है , लेकिन उनके अपने सिद्धांत और विधियां है। प्राथमिक तौर पर वहां भी नाड़ी स्पंदन के आधार पर ही चिकित्सा प्रारंभ करने या न करने का निर्णय लिया जाता है। अंगूठे के मूल के नीचे जो नाड़ी गति करती है, वो जीव की साक्षी है। तात्पर्य ये कि नाड़ी विज्ञान के ग्रंथों मेँ वर्णन है कि मनुष्य के शरीर में साढ़े तीन करोड़ मोटी पतली नाड़ियां होती हैं। वे नाभिकन्द से बंधी हुई हैं और वहां तिरछी ,ऊपर और नीचे की ओर संलग्न होकर स्थित हैं।

“प्राचीन ग्रंथों में नाड़ी को स्पंदन जीव होने का साक्ष्य माना है। ये जीवन और सप्राणता की परिचायक है “

आयुर्वेद के अनुसार , वात , पित्त और कफ तीन प्रकार के दोष शरीर में सदैव स्थित रहते हैं। तीन अँगुलियों के त्रिदोष अर्थात वात , पित्त और कफ के संतुलन का परीक्षण किया जाता है जब कभी इनका संतुलन बिगड़ता है तो शरीर में रोग पैदा हो जाते हैं अथवा जब कभी शरीर किसी रोग से ग्रसित होता हैं , उस समय वात, पित्त और कफ असंतुलित हो जाते हैं।

त्रिदोष ज्ञान के लिए अंगूठे के नीचे एक अंगुल छोड़कर नाड़ी पर अँगुलियों को रखा जाता है। पहले वात नाड़ी, मध्य में पित्त नाड़ी और अंत में कफ नाड़ी चलती है। तीनों नाड़ियों के लक्षण हैं वात के चंचल और गतिमान होने से पहले वात नाड़ी फड़कती हैं तथा कफ नाड़ी शीतल एवं मंद होने से अंत में मालूम पड़ती है। नाड़ी स्वभाव से ही तर्जनी के नीचे वात नाड़ी मध्यमा के नीचे पित्त नाड़ी तथा अनामिका के नीचे कफ नाड़ी चलती है।

शरीर में स्थित वात , पित्त और कफ के संतुलन से स्वास्थ्य बना रहता है। वात के कारण और शरीर में गति रहती है , रक्त संचार बना रहता है , श्वास प्रश्वास और भोज्य पदार्थों की गति इसी से बानी रहती है। पित्त के कारण और कफ के कारण शरीर की स्निग्धता बनी रहती है। वात , पित्त और कफ के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सक के परामर्श करना चाहिए और त्रिफलाचूर्ण (हरण , बहेड़ा व आंवला सम्भाग में ) के तीन तीन ग्राम की मात्रा का सुबह शाम गरम जल से सेवन करना उपयोगी सिद्ध हुआ है।

“शरीर में स्थित वात , पित्त और कफ के संतुलन से स्वास्थ्य बना रहता है। वात के कारण और शरीर में गति रहती है “

स्वस्थ नाड़ी स्वस्थ व्यक्ति की नाड़ी केंचुए तथा सांप की तरह स्थिर चलती है। रोगरहित व्यक्ति की नाड़ी प्रातः कल स्निग्ध चलती है। दोपहर को उष्णता से युक्त तथा शाम चंचल गति से चलती। है इस प्रकार की गति उन व्यक्तियों में होती , जो अधिक दिनों से निरोग होते है। अतः कफ का प्रकोप तथा सांयकाल वात का प्रकोप सामान्यतः होता है।

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