मध्यम वर्ग की पसंद

मध्यम वर्ग की पसंद

भारत मे मध्यम वर्ग सदैव से मूल्यों का संरक्षक रहा है | थोड़ा है और थोड़े की जरुरत है की भावना माध्यम वर्ग को आशावादी बनाती है | जीवन मई नमक-तेल वर्तमान भविष्य की चिंता , और इससे अपना संघर्ष माध्यम वर्ग को रत्नो का पारखी बना देती है | पाई-पाई सीने से चिपटाकर बचत करने वाला माध्यम वर्ग अपने धन के अपव्यय को कतई बर्दास्त नहीं करता | सुबह-सुबह कड़कड़ाती ठण्ड मई भी प्रातः भर्मण के लिए निकल पड़ने वाला माध्यम वर्ग चिकित्सा के दोनों पहुलओं स्वास्थ रक्षा और चिकित्सा (आयुर्वेदसम्मत विकारप्रशमन ) से भली भांति रु-ब-रु होता है |
चरकसंहिता सूत्रस्थान अध्याय ९ खुड्डाकचतुष्पदाध्यय = लघुचतुष्पदाध्यय , में महर्षि चरक ने रोगी मेँ अपेक्षित निम्न चार गुणों का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है -स्मृति निर्देशकारित्वं भिरुतवमथापि च |
ज्ञपकत्वं च रोगनामातुरस्य गुणा : स्मृता : |
१.रोगी को स्मृतिवान अर्थात अच्छी स्मरणशक्ति वाला होना चाहिए | ऐसा होने पर चिकित्सक को अपने रोगी -शरीर में घटने वाली विभिन्न दे पाने वाले समर्थ होता है और चिकित्सक को भी उसके रोग को समझने और उसके तह तक जाने मैं मदद मिलती है |
२. निर्देशकारिता ;-
रोगमुक्ति के लिए चिकित्सक रोगी को पालन योग्य आहार -विहार -औषध का निर्देश देता है | रोगी का कर्तव्य होता है कि वह उनके पालन का भरसक प्रयास करें |
३. अभीरुता :- रोगी को अभीरु अर्थात निडर होना चाहिए | चिकित्सक द्वारा निर्दिष्ट आहार -विहार -औषध के पालन मई उसे भयभीत नहीं होना चाहिए |
४ . ज्ञापकता :-
रोगी में यह गुण होना चाहिये कि वह जब चिकित्सक के पास जाय तो अपनी आतुरवस्था (रोगावस्था ) के संबंध में विचारो को सम्यक शब्दों के माध्यम से प्रकट कर सके | रोगो को समझने और औषध- व्यवस्था के निर्णय के लिए यह चिकित्सक के लिए बहुत मददगार साबित होता है |
वर्तमान परिदृश्य में चिकित्सा के दौरान प्राय : यही देखा जाता है कि मध्यम वर्ग में उक्त चारो गुण मिलते है | आर्थिक रूप से निम्न वर्ग और उच्च वर्ग में इन गुणों की कमी देखने को मिलती है | निम्न वर्ग अपनी अज्ञानता के कारण तो उच्च वर्ग अपने अहंकार के कारण स्वयं में उक्त गुणों का विकास नहीं कर पाते हैं | ऐसे रोगी अपनी बीमारी को छिपाने का प्रयास करने लगते हैं | ये अपेक्षा करते हैं कि चिकत्सक के सम्मुख उपस्थित हो जाना ही काफी है अब यदि चिकित्सक में सामर्थ्य है तो वह नाड़ी – परीक्षण विधियों का प्रयोग करें | बस हमेँ फ़टाफ़ट रोगमुक्त कर दें, किसी चमत्कार की तरह |
ऐसे रोगी रोग के संबंध में सुस्पष्ट, विश्वसनीय जानकरी देने से स्वयं तो बचते ही है साथ ही ऐसे चिकित्सक जो उनसे उनके रोगो को संबंध में सूक्ष्मता और विस्तार से चर्चा करते हैं उन्हें अनुभहीन समझने लगते हैं। ऐसे रोगियों को प्राय : इस प्रकार से कहते सुना जा सकता है – ” भई फलां डॉक्टर तो मुझसे पूछ रहा था कि क्या तकलीफ है ” जिस प्रकार बिगड़ी हुई गाड़ी के कल पुर्जो को गाड़ी सुधराने वाला खोलकर देखकर , चलाकर समझ जाता है कि गाड़ी में कहाँ और किस पुर्जे में गड़बड़ी आ गई है उसी प्रकार ऐसे रोगी अपेक्षा करते हैं वे चिकित्सक के सामने बस प्रस्तुत हो जायेँ , शेष कार्य तो चिकित्सक का हैं। वस्तुत: ऐसा नहीं है। निर्जीव वाहन और जीवित शरीर में इतनी समानता नहीं होती। मनुष्य अपने शब्दों द्वारा अपनी व्यथा को व्यक्त कर सकता है , मानव – शरीर के हर अंग अवयव को परिक्षार्थ खोला नहीं जा सकता।
आयुर्वेद मे चिकित्सक को पिता और रोगी को पुत्र का स्थान दिया गया हैं। चिकित्सक का कर्तव्य है कि अपने आयुर्वेद विषयक ज्ञान का उपयोग करते हुए रोगी की चिकित्सा ठीक वैसे ही करे जिस प्रकार वह अपने पुत्र की चिकित्सा करता। इसी प्रकार रोगी भी एक गुणवान आज्ञाकारी पुत्र की भाँति चिकित्सा को स्वीकार करता हुआ स्वास्थ- लाभ प्राप्त करें। तथाकथित निम्न वर्ग अपने तमोभाव को त्यागेगा तभी उसका अज्ञान दूर होगा। तथाकथित उच्च वर्ग अपने रजोभव का त्याग करेगा तभी उसका अहंकार दूर होगा। मध्यम वर्ग का मार्ग सत्वगुण – प्रधान मध्यममार्ग है। हम इस माध्यम मार्ग पर तभी चल पायेंगे जब हमारी दृष्टि निर्मल रहेगी। स्वच्छ दर्पण में ही स्वच्छ प्रतिबिम्ब बन सकता है। अज्ञानता और अहंकार रहित स्वच्छ मन में ही विवेक (उचित -अनुचित में अन्तर कर पाने की बुद्धि ) का उदय होता है –
तमसो माँ ज्योतर्गमय ,
असतो मा सद्गमय।
अर्थात हमारी प्रवृत्ति सदैव ऐसी रहे कि हम असत (अज्ञानता ) रूपी अहंकार से सत् (ज्ञान ) रुपी प्रकाश की ओर अग्रसर होते रहें।

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