महिलाओं में बढ़ता अवसाद

महिलाओं में बढ़ता अवसाद

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में अवसाद ग्रस्त लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत में ३६ प्रतिशत लोग कभी -न -कभी गंभीर अवसाद का शिकार रहे है। अध्ययन के मुताबिक भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा बड़ी संख्या में अवसाद -ग्रस्त हैं।
कभी ये माना जाता था कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम अवसाद ग्रस्त हुआ करती है, लेकिन अध्ययनों ने धारणा को गलत सिद्ध किया है। इसकी सबसे बड़ी वजह पुरुषों की तुलना में महिलाओं का ज्यादा भावनाप्रधान होना है।
अवसाद क्या है ?
अवसाद पूरे शरीर की बीमारी है। इसमें आपका शरीर, मूड और विचार सब कुछ शामिल रहता है। इसकी वजह से आपकी भूख और नींद अस्त -व्यस्त हो जाती है। आपके सोचने और जीने का तरीका बदल जाता है। अवसादग्रस्तता सबसे पहले आपको अकेला कर देती है।
अवसाद के लक्षण :-
अवसाद के लक्षण हर व्यक्ति में अलग होते है। फिर भी कुछ सामान्य लक्षण होते है, जिन्में प्रारंभिक तौर पर अवसाद के बारे में जाना जा सकता है।
० लगातार उदासी या फिर व्यग्रता या खालीपन का अहसास।
० हर दिन की गतिविधियों के प्रति उदासीनता या फिर अरुचि।
० बेचैनी , खीझ या फिर बात -बात पर रोना।
० अपराध -बोध, अर्थहीनता , असहायता और निराशा की िस्थति।
० बहुत ज्यादा या बहुत कम नींद आना और सुबह जल्दी नींद खुल जाना।
० ज्यादा भूख लगना या फिर खाने के प्रति अरुचि होना। इसके फलस्वरूप वजन कम होना या फिर बढ़ जाना।
० ऊर्जा का कम होना , लगातार थकान महसूस होना।
० लगातार मृत्यु के बारे में सोचना या फिर आत्महत्या का विचार आना।
० याद रखने और निर्णय लेने में मुश्किल महसूस होना और एकाग्रता का आभाव।
० इनके आलावा कुछ शारीरिक परेशानियां भी उभरती हैं, जैसे सिरदर्द , पाचनतंत्र में गड़बड़ी या फिर शरीर मेँ दर्द बना रहना।
महिलाओं में अवसाद के कारण ?
१. मासिक धर्म शुरू होने के वक्त, क्योंकि उस वक्त एक औरतोँ की जिंदगी में एकाएक परिवर्तन होते है और उसका मन इससे सामंजस्य बैठाने की प्रक्रिया मे होता है।
२. प्रसव के आसपास क्योंकि ये असल में एक लड़की को महिला में बदल देता है , इसके साथ बहुत सारे परिवर्तन जिंदगी में आते हैं।
३ मनोपॉज के दौरान …इस दौरान एक तो पहले ही शरीर मेँ हार्मोनल बदलाव होते हैं , दूसरे महिला इस असुरक्षा से ग्रस्त हो जाती है कि उसका ‘ वुमनहुड ‘ का वक्त ख़त्म हो गया है , मतलब कि वह माँ बनने की उम्र से बाहर चली गई है।
डॉक्टर और वैज्ञानिकों ने इसे ‘ शरीर – रचना की नियति ‘ (एनाटॉमी इस डेस्टिनी ) के तौर पर परिभाषित किया है,
लेकिन आधुनिक दौर में महिलाओं में अवसाद की कुछ और वजहें भी आ जुडी हैं।
४. शारीरिक परिवर्तन के आलावा परिवार -समाज में निभाई जाने वाली भूमिका भी महिलाओं में अवसाद की बड़ी वजह है।
५. शादी के बाद पारिवारिक विवाद , आर्थिक िस्थति फिर दाम्पत्य जीवन के ठीक न चलने की वजह से भी महिलाएं अवसादग्रस्त हो जाती हैं।
६. काम के असामान्य घंटे , काम के ज्यादा घंटे , कार्यस्थल पर दुर्व्यहार , भेदभाव और काम का दबाव।
७. बदले वक्त में महिलाओं की भूमिका का विस्तार हुआ है , और सामाजिक दायरे में उनकी सक्रियता बढ़ी है तो जाहिर है कि वे जगह -जगह बटेंगी और हर भूमिका में अपना १०० प्रतिशत चाह कर भी नहीं दे पाएंगी। ऐसे में उनकी परवरिश और परिवेश सब कुछ निर्णायक होगा।
परिवार , परिवेश ,कार्य -स्थल और खुद अपनी अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधना और खुद को हमेशा कसौटी पर कसते रहने की प्रवृतियो के बीच खुद महिला को पता ही नहीं चलता की वह कब अवसादग्रस्त हो गई।
हालाँकि इतने सारी वजहों को चिन्हित कर लेने के बाद भी महिलाओं में बढ़ते अवसाद की कोई निश्चित वजहें तलाशी नहीं जा सकी है। असल मेँ हर समाज की बनावट और उसमें महिलाओं की सक्रियता , भूमिका और िस्थति से उनके मानसिक स्वास्थ का गहरा सबंध हैं। हमारे समाज में अब भी , बीमारी का मतलब शारीरिक ही हुआ करता है इसलिए मानसिक स्वास्थ को लेकर हम अब भी बहुत जागरूक नहीं हो पाए हैं। उस पर यदि मामला महिलाओं के मानसिक स्वास्थ का तो उदासीनता दोहरी हो जाती है।

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