वात रोग आखिर है क्या

वात रोग आखिर है क्या

आयुर्वेद जो पकृति प्रदत्त औषध यानि जड़ी -बूटियों पर आधारित
चिकित्सा पद्धति है। इसके अंतर्गत वात, पित्त, कफ तीन प्रकृति
को मुख्यतः आधार मानकर जिसमें चिकित्सा की जाती है, वात
पित्त, कफ का शरीर मैं बढ़ना, कम होना , असंतुलित होना ,
संतुलित होना एक स्वाभाविक क्रिया है। मौसम के अनुसार व्यक्ति
की उम्र के अनुसार, दिनचर्या व आहार -विहार के अनुसार यह
घटता-बढ़ता रहता है। और थोड़ी सी समझदारी व नियम के
पालन से हम इसे संतुलित कर सकते हैं और स्वस्थ जीवन जी
सकते हैं।
वात तीन दोषो में से एक दोष है जो अकेला या अन्य दोषों के साथ
मिलकर रोग उत्पन्न करता है। आयुर्वेद मैं ८० वात रोगों का वर्णन
है। वायु मतलब गति या मूवमेंट जिस जगह पर वात की वृद्धि या
वात की विकृति होती हैं। यही आयुर्वेद चिकित्सा की सिद्धांत है
तथा स्थान व लक्षण के आधार पर आधुनिक विज्ञान के आधार पर
भी रोग पहचान कर आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था जाती है।
प्रकार :-
१. यदि वात पेट (उदर ) में विकृत होता है तो गुड़गुड़ाहट, आफरा
, पेट का फूलना , उदर संबंधित विकार , आनाह , आध्मान आदि

लक्षण उत्पन्न होते हैं। मूत्र का अवरोध , डकार , गेस्ट्रो एंट्रायटिस,
कोलिक , डकार ,कब्ज आदि रोग , जो कोष्ठ से संबंधित है।
२. मांस मेद गत मायोमेथी, मायलिज्या, थकान आदि रोग।
३. त्वक्गत पेरिफेरल न्यूराइटिस होता है।
४. अस्थि मज्जागत कमेटिज्म , ऑस्टियोमायलाइरिया होता है।
५. locaklised-Engored vein , spastic disease of
tendons & ligaments , osteoarthrosis, cramps,
tremors, sciatica broncial neuritis, frozen
shoulder muscles, pyogenic arthritis of knee
lock jaw, neck rigidity, trigeminal, neuralgia,
sprain, tingling sensation ctc.
६. Generalised : Hemiplegia paralysis, tremors,
palsy, parkinsonism, diseases of tenons and
ligaments etc.
आमवात , वातरक्त व सन्धिवात आदि पाए जाने वाले जोड़ो दर्द
संबंधित रोग है।
सन्धिवात :-
यह अधिकतर वृद्धावस्था में पाया जाता है। जो वात प्रधान होता है
इसमें ज्वर नहीं होता है व यह सभी संधियों में सामान रूप से

प्रारंभ होता है। आधुनिक विज्ञान मेँ ऑस्टियो अर्थराइटिस से
इसकी तुलना की हैं। कभी -कभी जोड़ो में ऑस्टियोफाइट्स
निर्माण हो जाता हैं।
वातरक्त :-
यह प्रायः छोटी संधियों से आरंभ होता है। हाथ -पैर की
अँगुलियों एवं संधियों इसके प्रमुख स्थान है इसमें ज्वर नहीं होता
है। जोड़ों में सूजन व सन्धिरक्त व् शूल इसके लक्षण है। आधुनिक
विज्ञान में गाउट से इसकी तुलना जा सकती है। जोड़ो में गांठ जैसे
बन जाते हैं।
आमवात :-
यह प्रायः १२ से ४० वर्ष के बीच पाया जाता है जो प्रायः बड़ी
संधियों से आरंभ होता है।
इसमें रोगी को ज्वर आता है जोड़ो में सूजन व् स्टिफनेस पायी
जाती है। इसमें जोड़ो में वृश्चिक दंशवत शूल होता है। आधुनिक
विज्ञान मेँ इसकी तुलना रूमेटाइड अर्थराइटिस से की है।
वात रोगो चिकित्सा में स्नेहन , स्वेदन (औषधयुक्त द्रव्यों से
मालिश व विशेष सिकाई ) की जाती है तथा औषध द्रव्यों का
प्रयोग व् आहार-विहार का संयोजन चिकित्सक निर्देश के अनुसार
करना चाहिए। एकल द्रव्यों में दशमूल , शिलाजीत, रास्ना , लहसुन

, पीपरामूल , शतावर , सोंठ बच ,बादाम तथा पिस्ता का प्रयोग
उत्तम है। गुग्गल , रास्ना, कुचला , शुद्ध भल्लातक, गुडूची,
निर्गुण्डी, एरण्ड स्नेह से बने योगों का प्रयोग लाभप्रद होता है।
एरण्ड तेल को विशेष उपयोगी कहा गया है।

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